देहरादून: NEET UG MBBS फर्जी सर्टिफिकेट मामले की जांच कर रही एसआईटी टीम मंगलवार को दो आरोपियों मास्टर माइंड रूपेश पंडित ओर अरविंद कुमार को गिरफ्तार करके जेल भेज चुकी है. दो आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद अब जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, उसका उतना ही बड़ा नेटवर्क सामने आ रहा है. जिन दो लेखपालों को निलंबित किया गया है, उनका पुराना रिकॉर्ड भी दागदार दिखाई दिया है.
NEET UG MBBS फर्जी सर्टिफिकेट मामला: जांच में सामने आया कि मास्टर माइंड रूपेश पंडित ने प्रति अभ्यर्थी से 45 लाख रुपए में सौदा किया था. एसएसपी प्रमेंद्र डोबाल ने स्पष्ट कहा है कि मामले में जो कोई भी सम्मिलित होगा, चाहे वह प्राइवेट हो या फिर सरकारी कर्मचारी जांच की आंच वहां तक भी जाएगी. साथ ही एसआईटी की टीम दो आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद अब पूरे मामले को कड़ी से कड़ी जोड़ने का प्रयास कर रही है.
एक ही स्वतंत्रता सेनानी के नाम से बनाए चार फर्जी प्रमाण पत्र: स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्र से जुड़े दो अलग-अलग मुकदमों की जांच में अब तक चार अभ्यर्थियों के नाम सामने आए हैं. आरोप है कि इन अभ्यर्थियों के लिए धर्मवीर वर्मा के नाम से फर्जी स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्र तैयार किए गए हैं. जांच में यह भी देखा जा रहा है कि प्रमाण पत्र तैयार करने, आवेदन लगाने और संबंधित दस्तावेज जताने की प्रक्रिया में किस-किस व्यक्ति की भूमिका रही है. यदि बैंक खातों और मोबाइल फोन से महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलते हैं, तो पुलिस गिरोह के अन्य सदस्यों तक पहुंच सकती है.
पुलिस की अब तक की पड़ताल में गिरोह का संचालन किसी संगठित कंपनी की तरह किए जाने के संकेत मिले हैं. इसमें हर सदस्य की भूमिका पहले से तय थी. पुलिस के अनुसार एक टीम एमबीबीएस में दाखिले के इच्छुक अभ्यर्थियों को तलाश थी. दूसरी उनकी सामाजिक या आरक्षित श्रेणी के अनुरूप दस्तावेज बताने और फर्जी प्रमाण पत्र तैयार करने की व्यवस्था करती थी. कुछ सदस्य प्रवेश की पूरी प्रक्रिया संभालते थे.
दाखिले की डील से लेकर कॉलेज तक पहुंचाने की होती थी जिम्मेदारी: गिरोह में कुछ सदस्यों की भूमिका अभ्यर्थियों से सौदा करने की थी. अन्य सदस्य दाखिले की प्रक्रिया पूरी करने के लिए सक्रिय रहते थे. पुलिस यह भी खंगाल रही है कि रकम किस स्तर पर तय होती थी. किस माध्यम से ली जाती थी और बाद में किन-किन लोगों तक पहुंचती थी. बैंक खातों और अन्य अन्य वित्तीय लेनदेन की पड़ताल केस की कड़ी में अहम मानी जा रही है.
पहले तलाशे जाते थे ग्राहक, फिर फिर तैयार होती थी योजना: पुलिस के अनुसार गिरोह का सदस्य ऐसे अभ्यर्थियों और परिजनों से संपर्क करता था, जो नीट में अपेक्षित परिणाम न आने या मनचाहे मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिलने के कारण दाखिले का रास्ता तलाश रहे थे. उन्हें निर्धारित प्रक्रिया से अलग आसान तरीके में एमबीबीएस में प्रवेश दिलाने का भरोसा दिया जाता था. अभ्यर्थी की जरूरत और श्रेणी समझने के बाद गिरोह के दूसरे सदस्य सक्रिय हो जाते थे.
बिहार का रूपेश है मास्टर माइंड: गिरफ्तार बिहार निवासी रूपेश पंडित मेरठ की द्वारिकापुरी कॉलोनी में पिछले 5 साल से मिकोडो पाठशाला नाम की कंसल्टेंसी चलकर पूरे सिंडिकेट को चला रहा था. इसकी आड़ में वह न सिर्फ देश के बड़े निजी विश्वविद्यालय, बल्कि विदेशों में भी एमबीबीएस समेत बीटेक, बीसीए और बीकॉम जैसे पेशेवर कोर्सो में तय कमीशन पर दाखिला दिलाने का खेल कर रहा था.
फर्जी सर्टिफिकेट से 45 लाख रुपए में हुआ था एक सीट का सौदा: आरोपी रूपेश पंडित ने उत्तराखंड में तीन छात्राओं को एमबीबीएस की सरकारी सीट दिलाने के लिए उनके परिजनों से 60 लख रुपए एडवांस ले लिए थे. आरोपी ने तीन छात्राओं को स्वतंत्रता सेनानी कोटे से सरकारी सीट दिलाने का पक्का भरोसा दिया था. प्रत्येक छात्रा के दाखिले के लिए 45 लाख रुपए की भारी भरकम रकम तय की गई थी. तीनों छात्राओं के परिजनों से 20-20 लाख रुपए बतौर एडवांस ले लिए गए थे. बाकी के पैसे दाखिला प्रक्रिया पूरी होने के बाद दिए जाने थे.
फॉरेंसिक जांच को भेजे गए आरोपियों के मोबाइल: आरोपी की गिरफ्तारी के बाद गिरोह में शामिल अन्य सदस्यों की पहचान के लिए आरोपियों के मोबाइल फोन जांच के लिए फॉरेंसिक लैब भेजे गए हैं. पुलिस को उम्मीद है कि मोबाइल की कॉल डिटेल, चैट, दस्तावेज और अन्य डिजिटल साक्ष्य से गिरोह के दूसरे सदस्यों की भूमिका सामने आ सकती है. एसआईटी यह भी देख रही है कि आरोपियों के संपर्क में कौन-कौन से अभ्यर्थी, बिचौलिए या अन्य व्यक्ति थे.