उत्तराखंड में पहाड़ों में स्कूल जाने के लिए छात्रों को बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कच्चे रास्ते, पहाड़ से टूट-टूट कर गिरते पत्थर, उफनाती नदियां और गदेरे आफत बने हुए हैं। ये मुश्किलें मानसूनी सीजन में कई गुना बढ़ जाती हैं। सिस्टम की लापरवाही से छात्र-छात्राओं को जान हथेली पर लेकर स्कूल जाना पड़ता है। आपदाओं का संकट तो है ही, साथ ही जंगली जानवरों के हमले का खतरा भी रहता है।
गोपेश्वर: नौ साल पहले टूटा पुल अभी नहीं बना
बरसात घुडसाल सैकोट के छात्र-छात्राओं के लिए किसी संकट से कम नहीं है। 2013 की आपदा में यहां नदी का पुल बह गया था, तब से यह पुल नहीं बना। कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं होने पर छात्रों को मजबूरी में चट्टान , बोल्डर और बड़े-बड़े पत्थरों के बीच से स्कूल जाना पड़ता है।
पूर्व जिला पंचायत सदस्य ऊषा रावत ने बताया कि आपदा के दौरान स्थानीय नदी में आई बाढ़ में यह पुल बह गया था। इसी पुल से होकर छात्र स्कूल जाते-आते थे। पुल निर्माण के लिए जिला प्रशासन और विभागीय अफसरों को भी कई बार कहा जा चुका है, लेकिन हालात जस के तस हैं।
रुद्रप्रयाग: पहाड़ी से पत्थर गिरने का खतरा
ऊखीमठ ब्लॉक के पठाली, किमाणा आदि स्थानों से राइंका ऊखीमठ आने के लिए छात्रों को संकरी सड़क के बीच गुजरना पड़ता है। यहां पहाड़ी से पत्थर गिरने का भय रहता है। मुख्यालय स्थित संगम बाजार, जागतोली, माई की मंडी, केदारनाथ हाईवे पर सुंरग का आधा किलोमीटर क्षेत्र भी काफी संवेदनशील है।
अत्यधिक बारिश होते ही पहाड़ी से पत्थरों की भी बरसात होने लगती है। अगस्त्यमुनि ब्लॉक के तूना-बौंठा के छात्र भी जीआईसी रुद्रप्रयाग और जीजीआईसी रुद्रप्रयाग तक गांव के गदेरों से पार कर पहुंचते हैं। डीएम मयूर दीक्षित का कहना है कि संवदेनशील क्षेत्रों और मार्गो से स्कूल आने वाले छात्रों की सुरक्षा के लिए सीईओ को निर्देश दे दिए।
उत्तरकाशी: नदी ट्राली से करनी पड़ती है पार
बड़कोट के चपटाड़ी गांव और बंचाण गांव के बीच रंखड़ी खड्ड बरसात के दिनों में जानलेवा बन जाता है। बारिश के दौरान तेज बहाव के साथ मलबा और बोल्डर बह कर आते हैं। 2020 से यहां नदी पार करने के लिए ट्रॉली है। इसी ट्राली में बैठकर छात्र-छात्राओं को आवागमन करना पड़ता है।
बंचाण गांव के छात्र-छात्राओं को राजकीय इंटर कॉलेज सरनौल में हर रोज पढ़ने के लिए जाना पड़ता है। स्थानीय लोग लंबे समय से यहां पुल बनाने की मांग कर रहे हैं। कुछ ऐसे ही हालात जीआईसी जखोल में के छात्रों के सामने भी है। लिवाड़ी, फिताडी, राला, कासला और रेंकचा गांव के छात्रों को उफनाते कासला खड्ड को कच्ची पुलिया के सहारे पार करना पड़ रहा है।
एकेश्वर: जानवरों के हमले का खतरा
एकेश्वर में ग्राम सभा रेडू के छात्रों को स्कूल जाने के लिए चार किलोमीटर का लंबा सफर तय करना होता है। बारिश के दौरान सारा क्षेत्र कंटीली झाड़ियों से भर जाता है। इस कारण हर वक्त जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है। अभिभावक मंजू देवी और छात्रा दीपिका बतातीं हैं कि छात्रों के लिए स्कूल आना जाना खतरे से खाली नहीं है।
कठूली के सुभाष रावत कहते हैं कि गांव का प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल चार साल से बंद है। इस वजह से गांव के बच्चे पढ़ाई के लिए दो किमी दूर पैदल और संकरे मार्ग से बग्यलि स्कूल जाते हैं। बारिश के दिनों अक्सर छुट्टी करनी पड़ती है।
पिथौरागढ़: स्कूल जाना हुआ मुश्किल
मुनस्यारी में बारिश की वजह से कई रास्ते बंद हैं। भारी बारिश से भ्योला नाला और भेरीगाड़ उफान पर है। इससे भ्योला, घागली, घुरूरी मनकोट के 50 से अधिक बच्चे जीआईसी बगीचा बगड़ नहीं जा पा रहे हैं। नालों पर पुल बहने से लोग परेशान हैं। लोगों ने वैकल्पिक पुल निर्माण की मांग की है। गरारी से घरूरी मनकोट के 24 बच्चे गोरी नदी पार स्कूल जाते हैं।
बागेश्वर: उफनाए गदेरों से स्कूल की पढ़ाई बंद
कपकोट और कांडा तहसील के छात्रों के लिए बारिश का मौसम किसी मुसीबत से कम नहीं होता। छात्रों को उफनाते नदी और गधेरों को पार कर स्कूल पहुंचना होता है। कपकोट में ढोक्टी, कर्मी गदेरों, खारबगड़, लीमा, काफली कमेड़ा, पोथिंग, उछात और सोरंगी में सबसे अधिक परेशानी है। अभिभावक बालादत्त जोशी व गोविंद कुमार ने बताया कि तीन महीने बच्चों को स्कूल भेजना कठिन होता है।
शिक्षा विभाग ने किया है स्कूलों को अलर्ट
मानसून सीजन के दौरान होने वाली मुश्किलों को देखते हुए माध्यमिक शिक्षा निदेशक आरके कुंवर और बेसिक शिक्षा निदेशक वंदना गरब्याल ने सभी अधिकारियों को एडवाइजरी जारी की है। अभिभावकों से अनुरेाध किया गया है कि गदेरे-नदी वाले रास्तों में वो छात्रों को अकेला न भेजें बल्कि अपनी निगरानी में ही स्कूल लाएं और लेजाएं। जर्जरहाल भवनों में पढ़ाई पर रोक लगाने के निर्देश देते हुए बरसात के दिनों पंचायत भवन या किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर पढ़ाई कराने के निर्देश दिए गए हैं।
