धरती के बढ़ते तापमान के साथ ही घरों को ठंडा रखने की जद्दोजहद भी बढ़ती जा रही है. हम घरों को ठंडा रखने के लिए एयर-कंडीशनर का जितना इस्तेमाल कर रहे हैं, हमारी धरती उतनी ही गर्म हो रही है. आखिर इसका विकल्प क्या है?
कई जगहों पर जब पारा चढ़ता है, तब घरों को ठंडा रखने के लिए एयर-कंडीशनर का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि हम आराम से रह सकें. हालांकि, अब यह सिर्फ आराम की बात नहीं रह गई है. बढ़ती गर्मी हमारे स्वास्थ्य, हमारी उत्पादकता, हमारी अर्थव्यवस्था और यहां तक कि हमारे अस्तित्व को भी प्रभावित कर सकती है. पूर्व-औद्योगिक स्तर से केवल 1.5 डिग्री सेल्सियस (2.7 डिग्री फॉरनहाइट) की वृद्धि 230 करोड़ लोगों को भीषण गर्मी की लहरों के खतरे में डाल सकती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर हम कार्बन उत्सर्जन में कटौती नहीं करते हैं, तो 2030 के दशक की शुरुआत तक तापमान में वृद्धि काफी ज्यादा लोगों को प्रभावित कर सकती है. गर्म मौसम पहले से ही हर साल 12,000 मौतों के लिए जिम्मेदार है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भविष्यवाणी की है कि 2030 तक गर्मी की वजह से हर साल 38,000 ज्यादा लोगों की मौत हो सकती है. इनमें सबसे ज्यादा संख्या बुजुर्गों की होगी. भीषण गर्मी से बचने के लिए एयर-कंडीशनर खरीदना तत्कालीन और आसान समाधान हो सकता है, लेकिन ऊर्जा की खपत करने वाले ये उपकरण केवल समस्याओं को बढ़ा रहे हैं. ये उपकरण समस्या का समाधान नहीं हैं. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की लिली रियाही ने डीडब्ल्यू को बताया, “हमें इस चक्र से बाहर निकलने की जरूरत है. जिस तरह हम मौजूदा समय में अपने घर और कार्यालय को ठंडा करते हैं, वह जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा कारक है. यह जलवायु परिवर्तन की गति को और तेज करता है” ऊर्जा की बढ़ती मांग एयर कंडीशनर हानिकारक रेफ्रिजरेंट का रिसाव करते हैं जो ग्लोबल वॉर्मिंग को बढ़ाते हैं.
साथ ही, दुनिया भर की इमारतों में उपयोग की जाने वाली कुल बिजली का लगभग 20% हिस्सा एसी और पंखे चलाने में खर्च होता है. इनमें से अधिकांश बिजली का उत्पादन अभी भी जीवाश्म ईंधन से होता है. अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, तेजी से गर्म होती धरती, भारत और चीन जैसे देशों में बढ़ती आबादी और लोगों की आय में वृद्धि की वजह से एसी का इस्तेमाल बढ़ रहा है. मौजूदा समय में दुनिया भर में इस्तेमाल किए जा रहे एसी की कुल संख्या करीब 200 करोड़ है, जो 2050 तक बढ़कर 560 करोड़ हो सकती है. एजेंसी का यह भी अनुमान है कि इस सदी के मध्य तक घरों को ठंडा रखने के लिए ऊर्जा की मांग तीन गुना बढ़ सकती है. यह उतनी ही ऊर्जा होगी जितनी आज के समय में भारत और चीन बिजली की खपत कर रहे हैं.
रियाही ग्लोबल कूल कोएलिशन नेटवर्क की समन्वयक भी हैं. यह नेटवर्क घरों और धरती को स्थायी तौर पर ठंडा रखने के उपायों को बढ़ावा देने पर काम कर रहा है. रियाही कहती हैं, “घरों को ठंडा रखने के लिए जो तत्कालीन उपाय किए जा रहे हैं उससे बिजली ग्रिड पर भी काफी दबाव पड़ेगा. अंतत: यह जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के प्रयासों में बाधा उत्पन्न करेगा” वह कहती हैं, “अनुमान के मुताबिक, 2050 तक सिर्फ घरों और कार्यालयों को ठंडा रखने के लिए कई देशों में 30 से 50 फीसदी बिजली खर्च होगी, जो अभी सिर्फ 15 फीसदी है. इसका साफ मतलब है कि ग्रिड पर काफी ज्यादा दबाव होगा और कई ग्रिड काम करना बंद कर सकते हैं” आखिर विकल्प क्या है? जिन देशों में ज्यादा गर्मी पड़ती है वहां के लोग आराम से रह सकें और काम कर सकें, इसमें एयर-कंडीशनर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. साथ ही, इनकी बिक्री से अर्थव्यवस्था का पहिया भी घूमता है. हालांकि, जब तक एसी काफी अधिक जलवायु के अनुकूल नहीं बन जाते, तब तक उनकी संख्या में बेतहाशा वृद्धि एक बड़ी चुनौती बन सकती है. रियाही का कहना है कि घरों को ठंडा रखने के विकल्पों के बारे में जागरूकता की कमी है. साथ ही, पैसे की कमी की वजह से भी लोग कम उत्सर्जन वाले और ऊर्जा की बचत करने वाले एसी नहीं खरीद पाते. वह कहती हैं, “एसी का मतलब बाजार का सबसे सस्ता एयर-कंडीशनर नहीं है.
