पहाड़ पर पलायन, पानी की दिक्कत और अन्य संसाधनों की कमी के कारण धान की सौ से ज्यादा प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं। वर्तमान में केवल बीस प्रजातियों की खेती की जा रही है, इनमें से भी कई प्रजातियां संकटग्रस्त हैं। कुमाऊं विवि के एक शोध में यह खुलासा हुआ है।
जंतु विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. सतपाल बिष्ट के निर्देशन में शोधकर्ता डॉ. अजय कुमार ने यह शोध किया है। शोध में पाया गया कि पर्वतीय क्षेत्रों में धान की करीब 120 किस्में उगाई जाती थीं, जिसमें से 102 विलुप्त हो चुकी हैं। काश्तकारों ने पिछले 70 वर्षों में कई प्रजातियों को उगाना बंद कर दिया गया है।
ये हैं कारण
शोधकर्ता के मुताबिक, पहाड़ों से पलायन के कारण कृषि कार्य से जुड़े लोग काफी कम रह गए हैं। साथ ही सीढ़ीनुमा खेतों तक पानी पहुंचाना आसान नहीं होता। वन्यजीवों के फसलों को नुकसान पहुंचाने से भी काश्तकार खेती से विमुख हो रहे हैं।
अधिक मेहनत और कम उपज
अधिक मेहनत और कम उपज भी पारंपरिक चावल की खेती में गिरावट का कारण है। लोग पारंपरिक चावल की जगह अधिक मुनाफा देने वाली सब्जी और फलों के साथ चावल की नई किस्मों की खेती करने लगे हैं।
लाल चावल के लाभ
लाल चावल में प्रोटीन, आयरन, जिंक, मैग्नीशियम, एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है। यह फाइबर का भी बड़ा स्रोत हैं। लाल चावल ग्लाइसेमिक इंडेक्स शुगर के स्तर को नियंत्रित करने में भी मदद करता है। इसमें वसा की मात्रा शून्य होती है।
विलुप्त होने वाली चावल की मुख्य प्रजातियां
नागीण, भालौ, मकरंद, बंगोई, ढणसालू, सौक्याण, कठलिया, लाल साठी, देवलाल, कुमाल्डी, बौंडा, गोविंद, कावनौली, लाल बासमती, घेसुआ, ऊंट, झुमकिया, धरिधान, चंपा, पार्वती, श्यामगिरी, झूसिया, गजैया, सुखनंदी, सुनकर आदि।
